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Wednesday, July 24, 2013

हिंदी हमारी मातृभाषा है.

                                 हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना ही चाहिये।







भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अंग्रेजियत का विरोध क्या किया,इस बहाने हिन्दी को दोयम और उनके बयान को राजनीतिक कहा गया।जबकि वक्त की नजाकत ये है कि देश को भारत और इंडिया में बाँटने वाली अंग्रेजी भाषा उसके जरिये से समाज में लगातार अपना दखल बढ़ा रही अंग्रेजियत पर इमानदारी से विचार करना चाहिये, लेकिन हो रहा है ठीक इसका उलटा।राजनाथ सिंह के शब्दों में शशि थुरुर ने जरुर राजनीति ढूंढी,जिन्हें हिंदी की जरुरत ही नहीं रही।विरोध तो तब होना चाहिये था,जब दिल्ली के अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय और सोनिया गाँधी के सामने २२५ दिनों से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कारवाही कराने की मांग को लेकर धरना दे रहे श्यामरुद्र पाठक की गिरफ्तारी हुई और तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
                        विरोध तब भी होना चाहिये था जब देश के सर्वोच्च अफसरों को चुनने वाली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी और अंग्रेजियत को बढ़ावा देने वाली प्रणाली लागू की जा रही थी।विवाद उस समय भी होना चाहिये था जब गुजरात उच्च न्यायालय ने तीन साल पहले एक फैसले में कहा था कि, हिन्दी राष्ट्रभाषा है ही नंही।
             अंग्रेजियत के विरोध का विरोध नया नंही है।हमारे देश के प्रधानमन्त्री ऑक्सफोर्ड में अंग्रेजों और देश को धन्यवाद देकर आये है कि, अंग्रेजों ने हमारे देश को जो सबसे बड़ा तोहफ़ा दिया है वो है अंग्रेजी।


भारत में कहा जाता है कि दुनिया को देखने की खिड़की अंगरेजी है।और यह बात अलग है कि लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोप समेत दुनिया के ज्यादातर देशों में अंग्रेजी से ज्यादा स्पेनिश बोली जाती है और यही कार्य और व्यापार की भाषा है।अंग्रजी की औकात देखनी हो तो इटली, फ्रांस और जर्मनी  चले जाइये। जल्दी कोई रास्ता बताने वाला भी नहीं मिलेगा।इसके बावजुद अंग्रेजी की श्रेष्ठता बोध वाली मान्यता के आधार पर भारतीय शिक्षा पद्धति मेंएक ऐसा वर्ग तैयार किया जिसने अंग्रेजी माध्यम के जरिये से शिक्षा हासिल की और देश का प्रभुवर्ग बन गया।रोज़ी रोज़गार के मोर्चे पर हिन्दी लगातार पिछड़ती चली गयी। इसका असर यह हुआ कि देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह अंग्रेजी स्कूल खुलने लगे।इसके बावजुद आज भी महज दो फीसदी लोग ही अंग्रेजी बोल पाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि जनतंत्र की बात करने वाली ताकतें केवल इन्हीं दो फीसदी लोगों की वकालत करने में हिचक नहीं दिखातीं।

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