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Thursday, August 1, 2013

विदेशी निवेश का सच !

सरकार ने रक्षा, टेलीकॉम तथा बीमा के क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि की है। पहले रक्षा क्षेत्र में 25 प्रतिशत से अधिक स्वामित्व विदेशी कंपनी द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता था। अब इससे अधिक की स्वीकृति दी जासकती है। टेलीकॉम क्षेत्र में पूर्व में 74 प्रतिशत विदेशी निवेश किया जा सकता था। अब 100 प्रतिशत किया जा सकेगा। बीमा क्षेत्र में सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी गई है। सोच है कि इन सीमाओं को बढ़ाने से विदेशी निवेशकों की रुचि बढ़ेगी, अधिक मात्रा में विदेशी निवेश आएगा और भारत की अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। इस समय हमारा बाहरी व्यापार गड़बड़ा रहा है। आयात अधिक और निर्यात कम है। विदेशी निवेश से मिली रकम से हम इस घाटे की भरपाई कर सकेंगे।
इन सुधारों के कारण अधिक मात्रा में विदेशी निवेश आएगा, इसमें संशय है।
पहला कारण कि नई फैक्ट्रियों को लगाने के लिए विदेशी निवेश आने में समय लगता है। मान लीजिए, कोई टेलीकॉम कंपनी भारत में धंधा करना चाहती है। पहले सर्वे किया जाएगा, रिपोर्ट बनेगी, बैंकों से अनुबंध होगा, सरकार से लाइसेंस लिया जाएगा, इसके बाद 2-3 साल में रकम धीरे-धीरे भारत आएगी। अत: इस सुधार से वर्तमान में सामने खड़े बाहरी व्यापार घाटे में राहत मिलने की संभावना कम ही है।
दूसरा कारण कि लाभांश प्रेषण का भार बढ़ रहा है। भारत में पूर्व में किए गए निवेश पर विदेशी कंपनियां लाभ कमाती हैं। समय क्रम में वे इस लाभ को अधिकाधिक मात्रा में अपने मुख्यालय भेजना शुरू कर देती हैं। तब हमारा व्यापार घाटा ज्यादा दबाव में आता है। आयातों के साथ-साथ हमें लाभांश प्रेषण के लिए भी डॉलर कमाने पड़ते हैं। 2010 में 4 अरब डॉलर, 2011 में 8 अरब डॉलर और 2012 में 12 अरब डॉलर लाभांश वापसी के रूप में बाहर भेजे गए। आने वाले समय में यह रकम तेजी से बढ़ेगी । विदेशी निवेश खोलने से हमें कुछ रकम मिले तो भी बढ़ते लाभांश प्रेषण से यह कट जाएगी।
तीसरी कारण है कि नई कंपनियों को स्थापित करने में नहीं, बल्कि उपलब्ध फैक्ट्रियों को खरीदने के लिए विदेशी निवेश आने की संभावना ज्यादा है, जैसे ड्रग कंपनी रैनबैक्सी को जापानी निवेशक ने खरीद लिया। जापानी खरीदार ने भारतीय मालिक को भुगतान किया। नई फैक्ट्री नहीं लगाई। देश में डॉलर तो आए, परंतु उत्पादन ज्यों का त्यों रहा।
प्रश्न है कि इस पॉलिसी की सफलता में संदेह के बावजूद भारतीय उद्यमी प्रसन्न क्यों हैं ?
देश के तीनों शीर्ष उद्योग संगठनों ने विदेशी निवेश खोले जाने की प्रशंसा की है। इनकी प्रसन्नता का कारण यह दिखता है कि इन्हें अपनी कंपनी को विदेशी खरीदार को बेचने का अवसर मिल जाएगा । उपरोक्त घोषणा के बाद टेलीकॉम की प्रमुख कंपनियों के शेयरों में उछाल आया। कारण यह कि विदेशी निवेशक द्वारा इन कंपनियों की खरीद की संभावना बढ़ी है। सिंगापुर का उद्यमी भारतीय कंपनी को खरीदने में रुचि ले सकता है यदि उसे कंपनी के 100 प्रतिशत शेयर मिल जाएं। तब कंपनी पर उसके कंट्रोल पर कोई विवाद नहीं होगा। वर्तमान में 74 प्रतिशत शेयर खरीदने में उसकी रुचि कम हो सकती है। अर्थ हुआ कि विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने से भारतीय उद्यमी द्वारा कंपनी को बेचकर मुनाफा कमाने का रास्ता खुल गया है। भारतीय कंपनी को खरीदने के लिए आ रहे विदेशी निवेश का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय विक्रेता प्राप्त रकम का क्या उपयोग करता है। यदि उसने प्राप्त रकम से दूसरे क्षेत्र में उद्योग लगाए तो अर्थव्यवस्था पर सुप्रभाव पड़ेगा, लेकिन यदि उसने इस रकम को बांग्लादेश अथवा ब्राजील भेजकर वहां कारखाना लगाया तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। जितनी रकम आएगी उतनी बाहर चली जाएगी। देश में उत्पादन भी पूर्ववत रहेगा। लाभ केवल भारतीय विक्रेता को हो सकता है।
एक और रोचक तथ्य यह है कि भारत से बाहर जाने वाले विदेशी निवेश का अनुपात लगभग स्थिर रहता है। अध्ययन किया तो पाया कि जितना विदेशी निवेश बाहर जाता है वह 20 प्रतिशत बढ़कर भारत में वापस आता है। यदि भारतीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है तो विदेशी निवेश ज्यादा मात्रा में आना चाहिए और कम मात्रा में जाना चाहिए। इसके विपरीत यदि भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर है तो विदेशी निवेश कम आना चाहिए और ज्यादा जाना चाहिए। ऐसा परिवर्तन नहीं दिख रहा है। इसका अर्थ हुआ कि विदेशी निवेश का हमारी अर्थव्यवस्था से कुछ लेना-देना नहीं है ।
आकलन है कि जो विदेशी निवेश आ रहा है वह अधिकतर भारतीय पूंजी की ही वापसी है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव का प्रभाव नहीं दिखता है । अत: वर्तमान उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना कम और घरेलू काले धन को घुमाकर वापस लाने को सरल बनाना अधिक है। स्पष्ट है कि वास्तविक विदेशी निवेश कम मात्रा में ही आ रहा है। विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर सरकार ने पूंजी के इस घुमाव को आसान बना दिया है।
विदेशी निवेश खोलने का यह वास्तविक उद्देश्य है। रिटेल और उड्डयन में विदेशी निवेश पूर्व में खोला जा चुका है, परंतु आवक शून्य रही। वर्तमान में टेलीकॉम आदि क्षेत्रों मे भी यही परिणाम रहेगा। इस नीति से देश की अर्थव्यवस्था पर एकमात्र प्रभाव यह पड़ेगा कि काला धन बढ़ेगा और अधिक मात्रा में रंग बदलकर वापस आएगा ।

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