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Wednesday, August 7, 2013

भारत का इस्लामीकरण रोकने के उपाय



 अगर हम राष्ट्रवादी हिन्दू भारत को मुस्लिम बहुसंख्यक  देश बनने से बचाना चाहते हैं । तो हमें योजनाबद्ध और संगठित  तरीके से काम करना होगा,हमें इनकी ताकत को ,इनकी कमजोरी को पहचानना होगा साथ ही साथ इनके तौरतरीकों को समझनना होगा ।मोटे तौर पे देखा जाय तो , ये बेतहाशा आबादी बढाते हैं ,औरतों का बहुत शोषण करते हैं यहाँ तक की औरतों को शिक्षा और मस्जिद में जाने का अधिकार ही  नहीं है ,गैरमुस्लिम इमारतों को तोड़ देते हैं, ,गैरमुस्लिमों को काट डालते हैं,क्योंकि मुसलमान कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं होते ।
       इस मसले पर हमें अपने पडोसी देश म्मायार को जरुर देखना चाहिये । आंग सान सू की ने म्मायार से रोहिंग्याई मुसलामानों को खदेड़ दिया और कानून पारित कर दिया कि ,मुसलामानों के  दो से ज्यादा बच्चे होने पर सरकार आगे के बच्चों को मार सकती है। आप समझ सकते हैं कि , इसके लिये कितनी दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है ।
                                    हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिये की मुसलामानों की असली ताकत इनकी आबादी है और इनकी औरतें इनकी कमजोरी हैं क्योंकि ज्यादातर मुस्लिम औरतें इस्लाम को पसंद ही नहीं करतीं हैं ।

मेरे व्यक्तिगत सुझाव 

१ :-भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं कट्टर हिन्दू राष्ट्र होना चाहिये ,

 क्योंकि मुसलमान कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं । आबादी बढ़ने पर ये गैरमुस्लिम इमारतों को तोड़ देते हैं और गैरमुस्लिमों को काट डालते हैं। ये  याद रहे कि इस्लाम में ईशनिंदा के बदले मौत की सजा दी जाती है ,हमें भी इसे कानूनन लागू करवा देना चाहिये । 

२:- मुसलामानों पर  परिवार नियोजन कानून का सख्ती  से लागू होना चाहिये ,

      कानून तोड़ने पर सख्त कारवाही होनी चाहिये जैसा कि सू  की ने किया । 

३:-मुस्लिम महिलाओं को आवश्यक रूप से  शिक्षा, तलाक  और मस्जिद में जाने का अधिकार  मिलना चाहिये ,

 हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि ,शिक्षित मुस्लिम महिलायें  इस्लाम को पसंद नहीं करतीं,केवल अशिक्षित मुस्लिम महिलायें ही इस्लाम का समर्थन करतीं हैं । जब ये मस्जिद में जाकर ख़ुद देखेंगी कि ,किस तरह इनके मासूम बच्चों को इस्लाम के नाम पर भड़का कर इंसान से शैतान बनाया जा रहा है ,ये विद्रोह पर उतर आयेंगी इस पर इन्हें तलाक का अधिकार भी मिल जाये तो इस्लाम की खिलाफ़त करने वाली ताकत मुसलामानों के घर में ही तैयार हो जाएगी । 
                       

४ :-मर्दरसों में शिक्षा पर आवश्यक रूप से प्रतिबन्ध लगना चाहिये ,

साथ ही साथ स्कूलों में बचपन से ही आवश्यक रूप से सनातन हिन्दू धर्म की शिक्षा दी जानी चाहिये । इससे मुस्लिम बच्चियां बचपन में हिन्दू धर्म की तरफ़ आकर्षित हो जाएंगी ,और युवा होने पर इस्लाम का त्याग कर के हिन्दू युवकों से ही विवाह करेंगी ,संभवतः मुस्लिम बच्चों के साथ भी होगा और वो भी युवा होने पर इस्लाम का त्याग कर के हिन्दू धर्म अपना लेंगे और विवाह  किसी एक हिन्दू लड़की के साथ ही करेंगे । 

५ :-खास मुसलामानों में आवश्यक रूप से   उत्तराधिकार का हक़ सिर्फ दो बच्चों को ही  मिलना चाहिये, 

यानि पिता की संपत्ति का बंटवारा सभी (१० से १५ )बच्चों में न कर के सिर्फ़ दो बच्चों में ही करना चाहिये ,इस कानून को दादा की संम्पति पर भी लागू कर देना चाहिये यानि दादा की  संम्पति को छिन कर (१० से १५ भाइयों से )  केवल दो भाइयों (पिता और चाचा की पीढ़ी के ) में बांटा देना चाहिये ।
                   इस कानून का असली फ़ायदा तभी मिलेगा जब इसे बेहद गोपनीय तरीके से पास करा के कम   से कम इक लाख अमीर मुसलमानों पर लागू कर दिया जाय और बाकी के निम्न और मद्ध्यम आय के मुसलामानों के डाटा बैंक पर काम शुरू कर दिया जाय ।
                                  पैतृक सम्पति हाथ से निकलती देख मुस्लिम समुदाय में खलबली मच जायेगी ,और सम्पति के लालच में संभवतः  मुसलमान ही मुसलमान को मारेगा या फिर अपने निजी स्वार्थों के ये स्वेच्छा से ही इस्लाम का त्याग कर के हिन्दू धर्म अपना लेंगे  ,क्योंकि इनका नैतिक स्तर बहुत अच्छा नहीं होता । इस तरह से मुस्लिम आबादी घट के मौज़ूदा का बीस प्रतिशत ही रह जायेगी ।
                             इतिहास पर गौर करें तो पायेंगे कि मुग़ल बादशाहों के १० से १२ शहजादे होते थे लेकिन उनमें से कोई इक बाकियों को मार कर , अपने पिता को कैदखाने में डाल कर ही राजगद्दी हासिल करता था ।
                      साथ ही साथ इस कानून को केवल मुस्लिमों पर ही लागू करना चाहिये क्योंकि गैरमुस्लिमों में दो से अधिक बच्चे सिर्फ़ बेटे की चाहत में ही होते हैं ,अगर गलती से भी इस कानून को समान रूप से सभी पर लागू कर दिया गया तो कुछ गैरमुस्लिम गलतफमी का शिकार हो सकते हैं ।

६ :- जबरन धर्मांतरण 

 आवश्यक कानून पारित कर के बाकी बचे मुसलामानों का जबरन धर्मांतरण कर देना चाहिये ।ये विरोध तो जरुर करेंगे लेकिन  इसके लिये मुस्लिम बहुल इलाकों में अनिश्चित कालीन कर्फ्यू लगा देना चाहिये और जो छिट पुट मुसलमान इधर उधर बचेंगे उन्हें नजरबन्द कर के सभी मुसलामानों को आर्थिक रूप से ब्लाक कर देना चाहिये ,इसका असर ये होगा कि ये बैंक से पैसा निकाल नहीं पायेंगे अपने घरों से निकल नहीं पायेंगे ,इनके घरों का राशन हफ्ता इक महीने में ख़तम हो जायेगा ,ये भूख प्यास से बेहाल हो कर इस्लाम का त्याग कर देंगे और  हिन्दू धर्म अपना लेंगे । 


इसके अलावा सामाजिक जागृती की भी जरुरत है जैसे मुसलिमों पर भरोसा कभी नहीं करना चाहिये ,क्योंकि मौक़ा मिलने पर ये धोखा जरुर देते हैं,और गैर मुस्लिम युवतियों को मुसलिमों से दूर रहना चाहिये । 


७ :-अंतिम विकल्प 


अगर हम सभी हिन्दू और हिंदूवादी संघटन ऊपर बताये गये सुझावों को कानूनन लागू करवा पाये तो हम भारत को इस्लामीकरण से बचा लेंगे ,इसके लिये हमें इक ऐसे नेता की जरुरत है जो निडर हो और दृढ निश्चयी भी हो,ये याद रहे की हम हिन्दुओं के पास वक़्त बहुत कम है ,आगामी भविष्य में  मौक़ा मिलने के आसार भी नहीं हैं ,जो भी हो सकता है आज के दौर में  ही हो सकता है ।
                                                             
                                               






                                             



                                               
                                            

      ऊपर दिये गये ये सुझाव  मेरे व्यक्तिगत हैं ,और मेरा दावा है कि ये बेहद अचूक और कारगर हैं ,लेकिन कामयाबी केवल गैरमुस्लिमों की एकता पर ही निर्भर करती है । 



                                          भारत का इस्लामीकरण


Saturday, August 3, 2013

भारत का इस्लामीकरण

मुग्लिस्तान ,एक दीर्घकालिक साजिश का मकसद 

                                                                           "  भारत में विभाजन की नींव उसी वक़्त पड़ गयी थी । जब भारत का प्रथम हिन्दू इस्लाम में दीक्षित हुआ था ।"-----मोहम्मद अली जिन्ना (१९४७ बंटवारे के वक़्त )


"भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है क्योंकि  यहाँ हिन्दू बहुसंख्यक हैं जिस दिन भारत में हम मुसलमान बहुसंख्यक हो जायेंगे उस दिन एक क्रांति के द्वारा एक नया मुस्लिम राष्ट्र बनेगा,क्योंकि हम मुसलमान कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं होते  । " ……. इमाम बुखारी (जामा मस्जिद नई दिल्ली )
                                                                                                        
क्या आपने कभी मस्जिद से चलने वाले भड़काऊ भाषणों के टेप सुने हैं ,अगर हाँ तो अब इन्हें नजरंदाज़ करना ख़तरनाक भी हो सकता है ।क्योंकि मस्जिदों  में मुसलमानों से कहा जाता है कि ,अपने आसपास कमसेकम दस मुसलामानों को बसाओ ,जितना हो सके उनकी मदद करो ,ज्यादा से ज्यादा शादियाँ करके दस से पंद्रह बच्चे पैदा करो ,ज्यादा से ज्यादा आबादी बढाओ ,खरीदारी केवल मुसलामानों से ही करो ,इससे इस्लाम ताक़तवर बनेगा और ऐसा तबतक करो जब तक पूरी दुनियाँ पर इस्लाम का राज़ न हो जाये । 
आज हम सभी हिन्दु अच्छी तरह से जानतें हैं कि हमारे देश में बहुत से अवैध प्रवासी मुसलमान रह  रहे हैं । इनकी तादाद करोड़ों में है ,इनमें से कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं और कुछ म्मयार से खदेड़े गये रोहिंग्याई मुसलमान हैं । इन्हें हमारे देश की मौज़ूदा सरकार का मौन समर्थन भी  मिला हुआ है । बाहर से आने वाले  ज्यादातर मुसलमान यातो  कूड़ा बीनने का व्यसाय करते हैं या कबाड़ का कारोबार करते हैं । इनके परिवारों के चार छः लोग मिल कर दिन भर में इतनी पोलिथिन और प्लास्टिक जमा कर लेते हैं कि वो सब मिला कर हजार रुपयों में बिक जाता है । आप ख़ुद समझ सकते हैं कि ये कितनी जल्दी आर्थिक रूप से मजबूत हो जाते हैं और ज़िहाद  के नाम पे चंदा देने लायक हो जाते हैं । ये कहीं भी खाली पड़ी जमीन पर झुग्गियाँ बना के रहने लगते हैं और उस जमीन पर अवैध कब्ज़ा कर लेते हैं । असली समस्या तब आती है जब इनका कोई मर जाता है ,ये चुपके से उसकी लाश को किसी खाली पड़ी जमीन में दफना देते हैं और वहां वक्फ़बोर्ड लिख के टांग देते हैं।भारत में  आधिकारिक रूप से ३३ करोड़ मुसलमान रहते है ,लेकिन हकीकत ये है  कि भारत में इस वक़्त ४० से ४५ करोड़ मुसलमान रह रहे  हैं।  
अगर बीते हुए वक़्त पे गौर करें पायेंगे कि तीस सालों में मुसलामानों की आबादी ८ से १२ गुनी हो जाती है । इसका एक बहुत डरावना मतलब भी है ,वो ये है की ,
आज से तीस साल बाद भारत एक मुसलिम बहुसंख्यक देश हो जायेगा ।
और उस वक़्त मुसलमान भारत को एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिये एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देंगें ,आप ख़ुद भी समझ सकते हैं कि ,वो वक़्त कितना भयानक होगा । 
और उस वक़्त आज की युवा पीढ़ी बुजुर्ग होगी ,और हमारी तीसरी पीढ़ी यानि  हमारे पोते पोतियों की पीढ़ी जन्म ले चुकी होगी । जीवन में आराम के पड़ाव पर अपनी आँख के सामने अपने बीवी बच्चों और फूल से प्यारे मासूम पोते पोतियों को कटते हुए देखना बहुत कष्टकारी होगा । उस वक़्त हम बिलकुल बेबस होंगे ,उस वक़्त हम कुछ भी नहीं कर पायेंगे ,जो कुछ हो सकता है आज के दौर में  ही हो सकता है । 
आपने अक्सर फेसबुक पे दी गयी टिप्णियों में मुग्लिस्तान का जिक्र जरुर देखा होगा ,उस तथाकथित मुस्लिम बहुसंख्यक राष्ट्र का नाम होगा  "मुगालिस्तान "। इसके पीछे मुसलामानों का तर्क है कि ,मुगलों ने इस मुल्क पे ८०० सालों तक हुकुमत की है । ये मुसलामानों की अपनी सोच है ,हमें सिर्फ़ ये देखना है कि  अपने देश को मुसलिम बहुसंख्यक बनने से कैसे बचाना है । चाहे कश्मीर हो चाहे आसाम हो या चाहे केरल हो मुसलमानों ने हमेशा एक जैसा ही बर्ताव किया है पहले अपनी आबादी को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया ,फिर मंदिरों और अन्य गैरमुस्लिम धार्मिक स्थलों को नष्ट करना शुरू कर दिया,और आखिरकर हिन्दुओं और अन्य गैरमुस्लिमों को यातो खदेड़ दिया या काट दिया । हम हिन्दुओं के पास अब ज्यादा वक़्त नहीं बचा है,हमें जो भी करना है आज के दौर में  ही करना होगा । 

सबसे पहले मैं मुग्लिस्तान की रूपरेखा के बारे बताना चाहूँगा ,१९४७ में बँटवारे के वक़्त दो देश बने थे  ,भारत हिन्दुओं के लिये और पकिस्तान मुस्लिमों के लिये । पकिस्तान दो हिस्सों में  बटा था पूर्वी पकिस्तान (जो आज बांग्लादेश है ) और पश्छिमी पाकिस्तान (मौज़ूदा पाकिस्तान )। १९७१ में बांग्लादेश लिबरेशन वार के चलते बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ । १९४७ के दौरान मुसलमान पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच के सारे क्षेत्र को मिला कर एक संयुक्त मुस्लिम राष्ट्र चाहते थे , और अब फिर से चाहने लगे हैं । लेकिन इस बार वो ज्यादा से ज्यादा जमीन घेरना चाहते हैं ,जो कि एक चिंता का विषय है । 



                            भारत का इस्लामीकरण रोकने के उपाय




Thursday, August 1, 2013

विदेशी निवेश का सच !

सरकार ने रक्षा, टेलीकॉम तथा बीमा के क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि की है। पहले रक्षा क्षेत्र में 25 प्रतिशत से अधिक स्वामित्व विदेशी कंपनी द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता था। अब इससे अधिक की स्वीकृति दी जासकती है। टेलीकॉम क्षेत्र में पूर्व में 74 प्रतिशत विदेशी निवेश किया जा सकता था। अब 100 प्रतिशत किया जा सकेगा। बीमा क्षेत्र में सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी गई है। सोच है कि इन सीमाओं को बढ़ाने से विदेशी निवेशकों की रुचि बढ़ेगी, अधिक मात्रा में विदेशी निवेश आएगा और भारत की अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। इस समय हमारा बाहरी व्यापार गड़बड़ा रहा है। आयात अधिक और निर्यात कम है। विदेशी निवेश से मिली रकम से हम इस घाटे की भरपाई कर सकेंगे।
इन सुधारों के कारण अधिक मात्रा में विदेशी निवेश आएगा, इसमें संशय है।
पहला कारण कि नई फैक्ट्रियों को लगाने के लिए विदेशी निवेश आने में समय लगता है। मान लीजिए, कोई टेलीकॉम कंपनी भारत में धंधा करना चाहती है। पहले सर्वे किया जाएगा, रिपोर्ट बनेगी, बैंकों से अनुबंध होगा, सरकार से लाइसेंस लिया जाएगा, इसके बाद 2-3 साल में रकम धीरे-धीरे भारत आएगी। अत: इस सुधार से वर्तमान में सामने खड़े बाहरी व्यापार घाटे में राहत मिलने की संभावना कम ही है।
दूसरा कारण कि लाभांश प्रेषण का भार बढ़ रहा है। भारत में पूर्व में किए गए निवेश पर विदेशी कंपनियां लाभ कमाती हैं। समय क्रम में वे इस लाभ को अधिकाधिक मात्रा में अपने मुख्यालय भेजना शुरू कर देती हैं। तब हमारा व्यापार घाटा ज्यादा दबाव में आता है। आयातों के साथ-साथ हमें लाभांश प्रेषण के लिए भी डॉलर कमाने पड़ते हैं। 2010 में 4 अरब डॉलर, 2011 में 8 अरब डॉलर और 2012 में 12 अरब डॉलर लाभांश वापसी के रूप में बाहर भेजे गए। आने वाले समय में यह रकम तेजी से बढ़ेगी । विदेशी निवेश खोलने से हमें कुछ रकम मिले तो भी बढ़ते लाभांश प्रेषण से यह कट जाएगी।
तीसरी कारण है कि नई कंपनियों को स्थापित करने में नहीं, बल्कि उपलब्ध फैक्ट्रियों को खरीदने के लिए विदेशी निवेश आने की संभावना ज्यादा है, जैसे ड्रग कंपनी रैनबैक्सी को जापानी निवेशक ने खरीद लिया। जापानी खरीदार ने भारतीय मालिक को भुगतान किया। नई फैक्ट्री नहीं लगाई। देश में डॉलर तो आए, परंतु उत्पादन ज्यों का त्यों रहा।
प्रश्न है कि इस पॉलिसी की सफलता में संदेह के बावजूद भारतीय उद्यमी प्रसन्न क्यों हैं ?
देश के तीनों शीर्ष उद्योग संगठनों ने विदेशी निवेश खोले जाने की प्रशंसा की है। इनकी प्रसन्नता का कारण यह दिखता है कि इन्हें अपनी कंपनी को विदेशी खरीदार को बेचने का अवसर मिल जाएगा । उपरोक्त घोषणा के बाद टेलीकॉम की प्रमुख कंपनियों के शेयरों में उछाल आया। कारण यह कि विदेशी निवेशक द्वारा इन कंपनियों की खरीद की संभावना बढ़ी है। सिंगापुर का उद्यमी भारतीय कंपनी को खरीदने में रुचि ले सकता है यदि उसे कंपनी के 100 प्रतिशत शेयर मिल जाएं। तब कंपनी पर उसके कंट्रोल पर कोई विवाद नहीं होगा। वर्तमान में 74 प्रतिशत शेयर खरीदने में उसकी रुचि कम हो सकती है। अर्थ हुआ कि विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने से भारतीय उद्यमी द्वारा कंपनी को बेचकर मुनाफा कमाने का रास्ता खुल गया है। भारतीय कंपनी को खरीदने के लिए आ रहे विदेशी निवेश का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय विक्रेता प्राप्त रकम का क्या उपयोग करता है। यदि उसने प्राप्त रकम से दूसरे क्षेत्र में उद्योग लगाए तो अर्थव्यवस्था पर सुप्रभाव पड़ेगा, लेकिन यदि उसने इस रकम को बांग्लादेश अथवा ब्राजील भेजकर वहां कारखाना लगाया तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। जितनी रकम आएगी उतनी बाहर चली जाएगी। देश में उत्पादन भी पूर्ववत रहेगा। लाभ केवल भारतीय विक्रेता को हो सकता है।
एक और रोचक तथ्य यह है कि भारत से बाहर जाने वाले विदेशी निवेश का अनुपात लगभग स्थिर रहता है। अध्ययन किया तो पाया कि जितना विदेशी निवेश बाहर जाता है वह 20 प्रतिशत बढ़कर भारत में वापस आता है। यदि भारतीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है तो विदेशी निवेश ज्यादा मात्रा में आना चाहिए और कम मात्रा में जाना चाहिए। इसके विपरीत यदि भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर है तो विदेशी निवेश कम आना चाहिए और ज्यादा जाना चाहिए। ऐसा परिवर्तन नहीं दिख रहा है। इसका अर्थ हुआ कि विदेशी निवेश का हमारी अर्थव्यवस्था से कुछ लेना-देना नहीं है ।
आकलन है कि जो विदेशी निवेश आ रहा है वह अधिकतर भारतीय पूंजी की ही वापसी है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव का प्रभाव नहीं दिखता है । अत: वर्तमान उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना कम और घरेलू काले धन को घुमाकर वापस लाने को सरल बनाना अधिक है। स्पष्ट है कि वास्तविक विदेशी निवेश कम मात्रा में ही आ रहा है। विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर सरकार ने पूंजी के इस घुमाव को आसान बना दिया है।
विदेशी निवेश खोलने का यह वास्तविक उद्देश्य है। रिटेल और उड्डयन में विदेशी निवेश पूर्व में खोला जा चुका है, परंतु आवक शून्य रही। वर्तमान में टेलीकॉम आदि क्षेत्रों मे भी यही परिणाम रहेगा। इस नीति से देश की अर्थव्यवस्था पर एकमात्र प्रभाव यह पड़ेगा कि काला धन बढ़ेगा और अधिक मात्रा में रंग बदलकर वापस आएगा ।

Sunday, July 28, 2013

अनमोल वचन

इन्हें जरूर आजमायें -
* घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं। इससे परिवार में प्रेम बढ़ता है। तुलसी के पत्तों के नियमित सेवनसे कई रोगों से मुक्ति मिलती है।
* ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा साफ-सुथरा रखें ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणें घर में प्रवेश कर सकें।
* भोजन बनाते समय गृहिणी का हमेशा मुख पूर्व की ओर होना चाहिए। इससे भोजन सुपाच्य और स्वादिष्ट बनता है। साथ ही पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की पाचन शक्ति में वृद्धि होती है।
... * जो बच्चे में पढ़ने में कमजोर हैं, उन्हें पूर्व की ओर मुख करके अध्ययन करना चाहिए। इससे उन्हें लाभ होगा।
*जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा है, उन्हें वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) के कमरे में रहना चाहिए। इससे उनका विवाह अच्छे और समृद्ध परिवार में होगा।
* रात को सोते वक्त व्यक्ति का सिर हमेशा दक्षिण दिशा में होना चाहिए। कभी भी उत्तर दिशा की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। इससे अनिद्रा रोग होने की संभावना होती है साथ ही व्यक्ति की पाचन शक्ति पर विपरीत असर पड़ता है।
* घर में कभी-कभी नमक के पानी से पोंछा लगाना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
*घर से निकलते समय माता-पिता को विधिवत (झुककर) प्रणाम करना चाहिए। इससे बृहस्पति और बुध ठीक होते हैं। इससे व्यक्ति के जटिल से जटिल काम बन जाते हैं।
* घर का प्रवेश द्वार एकदम स्वच्छ होना चाहिए। प्रवेश द्वार जितना स्वच्छ होगा घर में लक्ष्मी आने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।
* प्रवेश द्वार के आगे स्वस्तिक, ॐ, शुभ-लाभ जैसे मांगलिक चिह्नों को उपयोग अवश्य करें।
* प्रवेश द्वार पर कभी ‍भी बिना सोचे-समझे गणेशजी न लगाएं। दक्षिण या उत्तरमुखी घर के द्वार पर ही गणेशजी लगाएं।
* विवाह पत्रिका कभी भूलकर भी न फाड़े क्योंकि इससे व्यक्ति को गुरु और मंगल का दोष लग जाता है।
* घर में देवी-देवताओं की ज्यादा तस्वीरें न रखें औरशयन कक्ष में तो बिलकुल भी नहीं।
* शयन कक्ष में टेलीविजन कदापि न रखें क्योंकि इससे शारीरिक क्षमताओं पर विपरीत असर पड़ता है।
* दफ्तर में काम करते समय उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके बैठें तो शुभ रहेगा, जबकि बॉस (कार्यालय प्रमुख) का केबिन नैऋत्य कोण में होना चाहिए।
* घर के भीतर शंख अवश्य रखें। इससे बजाने से 500 मीटर के दायरे में रोगाणु नष्ट होते हैं।
* पक्षियों को दाना खिलाने और गाय को रोटी और चारा खिलाने से गृह दोष का निवारण होता है।

Thursday, July 25, 2013

हमारे देशी वैज्ञानिकों के देशी आविष्कार

                                   बायोमास गैसीफायर



                                                   किसान  राय सिंह
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के किसान राय सिंह को लोग अब इंजीनियर साहब कहते हैं । उन्होंने कचरे से चलने वाला गैसीफायर बनाया है । इस गैसीफायर से जनरेटर चला कर बिजली भी बनायी जा सकती है । खेतों में ट्यूबवेल भी चलाये जा सकते हैं । राय सिंह बिना तेल और बिजली से चलने वाला इंजन बनाना चाहते थे
,जिसके लिये कई वर्षों तक रिसर्च मैं जुटे रहे । सबसे पहले उन्होंने ५ केवी का इंजन बिना डीजल के चलाया । समय के साथ साथ उसमें सुधार होता गया ,जल्द ही उन्होंने ऐसा गैसीफायर बना दिया ,जो बायोमास यानि जैविक कचरे से चलता है । और एक घंटे में २० किलोग्राम कचरे से ३० होर्सपावर का इंजन एक घंटे चला सकता है । ये गैसीफायर खेतों में पड़े कचरे  से और छिलके से भी चल सकता है ।
http://www.thehindu.com/sci-tech/agriculture/biowaste-gasifier-that-works-out-cheaper-than-grid-power/article95927.ece

Wednesday, July 24, 2013

कहीं तो हम ग़लत हैं ।


                                                 भारत कभी सोने की चिड़िया जैसा देश था। 
                   






भारत देश का सुनहरा अतीत है. भारत आध्यात्म और धन वैभव से संपन्न देश था . बहुत से विदेशी यात्री यहाँ आये और यहाँ के नागरिकों के उच्च जीवन स्तर से काफी प्रभावित हुए. इसके बाद लुटरे और आक्रमणकारी आये. भारत सदियों से वीरों का देश रहा है. आमने सामने की वो लुटरे कामयाब नहीं हो पाये।
                            लेकिन छल से वो कामयाब हो गये । ऐसा ही गोरों के साथ हुआ।और एक लंबी लड़ाई के बाद १९४७ में सत्ता हस्तांतरण हो गया।अंग्रेज सत्ता नेहरु को सौंप कर या ये कहिये जिन्ना और जवाहर में बाँट कर चले गये।
मैं आजतक ये नहीं समझ कि गाँधी जी ने नेहरु जी में ऐसी क्या खूबी देखी, जो उन्हें प्रथम प्रधानमंत्री का गौरव प्रदान किया,और इसके लिये बँटवारा तक मंजूर कर लिया।इसके बाद से अबतक भारत में बाहुबली और भ्रष्टाचारियों का ही राज चला है,और ये सिलसिला अब थमना चाहिये।

हिंदी हमारी मातृभाषा है.

                                 हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना ही चाहिये।







भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अंग्रेजियत का विरोध क्या किया,इस बहाने हिन्दी को दोयम और उनके बयान को राजनीतिक कहा गया।जबकि वक्त की नजाकत ये है कि देश को भारत और इंडिया में बाँटने वाली अंग्रेजी भाषा उसके जरिये से समाज में लगातार अपना दखल बढ़ा रही अंग्रेजियत पर इमानदारी से विचार करना चाहिये, लेकिन हो रहा है ठीक इसका उलटा।राजनाथ सिंह के शब्दों में शशि थुरुर ने जरुर राजनीति ढूंढी,जिन्हें हिंदी की जरुरत ही नहीं रही।विरोध तो तब होना चाहिये था,जब दिल्ली के अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय और सोनिया गाँधी के सामने २२५ दिनों से हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कारवाही कराने की मांग को लेकर धरना दे रहे श्यामरुद्र पाठक की गिरफ्तारी हुई और तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
                        विरोध तब भी होना चाहिये था जब देश के सर्वोच्च अफसरों को चुनने वाली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी और अंग्रेजियत को बढ़ावा देने वाली प्रणाली लागू की जा रही थी।विवाद उस समय भी होना चाहिये था जब गुजरात उच्च न्यायालय ने तीन साल पहले एक फैसले में कहा था कि, हिन्दी राष्ट्रभाषा है ही नंही।
             अंग्रेजियत के विरोध का विरोध नया नंही है।हमारे देश के प्रधानमन्त्री ऑक्सफोर्ड में अंग्रेजों और देश को धन्यवाद देकर आये है कि, अंग्रेजों ने हमारे देश को जो सबसे बड़ा तोहफ़ा दिया है वो है अंग्रेजी।


भारत में कहा जाता है कि दुनिया को देखने की खिड़की अंगरेजी है।और यह बात अलग है कि लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोप समेत दुनिया के ज्यादातर देशों में अंग्रेजी से ज्यादा स्पेनिश बोली जाती है और यही कार्य और व्यापार की भाषा है।अंग्रजी की औकात देखनी हो तो इटली, फ्रांस और जर्मनी  चले जाइये। जल्दी कोई रास्ता बताने वाला भी नहीं मिलेगा।इसके बावजुद अंग्रेजी की श्रेष्ठता बोध वाली मान्यता के आधार पर भारतीय शिक्षा पद्धति मेंएक ऐसा वर्ग तैयार किया जिसने अंग्रेजी माध्यम के जरिये से शिक्षा हासिल की और देश का प्रभुवर्ग बन गया।रोज़ी रोज़गार के मोर्चे पर हिन्दी लगातार पिछड़ती चली गयी। इसका असर यह हुआ कि देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह अंग्रेजी स्कूल खुलने लगे।इसके बावजुद आज भी महज दो फीसदी लोग ही अंग्रेजी बोल पाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि जनतंत्र की बात करने वाली ताकतें केवल इन्हीं दो फीसदी लोगों की वकालत करने में हिचक नहीं दिखातीं।